Thursday, 2 July 2015

ठंडा है चूल्हा माँ
सर्द पड़ी है दीवारे घरकी
बुझ गयी लौ दिए की
प्यासा प्यासा आँगन हैं...
तू नहीं हैं घर में तो जैसे
चमन में बहार नहीं हैं
  सोनाली
1/4/2015
ये क्या अंदाज़ है आपका
चाह रखतें हो हमारी और चाहतें भी नहीं
चलते चलते तुमनेँ कभी कहाँ था
मिल भी जायेगी ज़िन्दगी तुम्हें ,किसी मोड़ के बाद

हर मोड़ पर जो मैं छोड़ आयी खुद को थोड़ा थोड़ा
ज़िन्दगी मिल गयी मुझे अब खुद को खोने के बाद
जैसे पत्थर के बने थे हम
हर कोई तराशता गया
अपनी अपनी चाहतमें
 ...
31/3/2015
हम तो टुटे सपनोंकों भी समेट लेते है.. ना जाने कही किसी मोड पर कोई उन्हें जोड दे...
दिन ढलेगा जब भी , यक़ीन है हमे
आओगे तुम अपनी ही तलाश में....
साया जो अपना छोड़ गए थे
जब साथ तुम्हारा मैंने माँगा था...

सोनाली देशमुख
26/03/2015
जबभी खुश होता हू मैं
कहा होती हो तुम?
नज्म मेरी आतीही नही हो पास...
जबभी घेरा होता हू गमसे
आ जाती हो न जाने कहासें
और फिर कहती हो
मेरे हिस्सेमें तो बस तुम्हारे गम ही हैं जान?
सोना देशमुख
२/७/२०१५